Tuesday, September 19, 2017

वक़्त से पहले

अच्छा हुआ
वक़्त से पहले ही
आकर
तू चला गया,

असहिष्णुता के उपद्रव
के भोजन को
तू नहीं था,
तेरी बातें थी मात्र
दिखाने को
रास्ता!

Saturday, September 16, 2017

ਸੁਪਣਾ

ਨਾ ਮਿਲੀੰ ਕਦੇ ਤੂੰ
ਪਰ ਖਿੱਚ ਇਵੇਂ ਹੀ
ਪਾਈ ਰੱਖੀਂ,
ਮੇਰਿਏ ਮੰਜ਼ਿਲੇ
ਰਾਹਾਂ ਆਪਣੇ
ਮੈਨੂੰ ਤੂੰ ਪਾਈ ਰੱਖੀਂ!

ਨ ਮਿਟਾਵੀਂ ਮੇਰੀ ਪਯਾਸ
ਬੁੱਕ ਬੁੱਲਾਂ ਤੇ
ਇਵੇਂ ਲਵਾਈ ਰੱਖੀਂ,
ਟੁੱਟ ਨ ਜਾਵੀਂ
ਸੁਪਣੇ ਵਾਂਗੂ,
ਨੀਂਦ ਚ ਮੈਨੂੰ
ਜਗਾਈ ਰੱਖੀਂ!

तीर

चुभते हैं
आपके तीर
मगर इन का
इंतज़ार रहता है,

तड़पता है
हर झूठ
दम निकलने से पहले,
फिर मुक्ति की उम्मीद में
इत्मिनान करता है!

Wednesday, September 13, 2017

शर्त

तेरी हर फ़रियाद
क़ुबूल करने को
राज़ी है
ख़ुदा,
शर्त ये है
कि फिर कभी
फ़रियाद न मानने की
फ़रियाद न करेगा!

छत

बेघर होकर भी
रख पगड़ी पर हाथ
कहता है
कि उसके सर पर
छत है,

क्या ग़ज़ब होगी
गुरसिख की
मनःस्थिति,
जो उसकी
ऐसी मत है!

Tuesday, September 12, 2017

इम्तेहान

न दे सीस
मगर सोच तो दे,

कहता है ख़ुद को सिंह
इम्तेहान तो दे!

Monday, September 11, 2017

काँच की खिड़की

रात
आयेगा
बर्फ़ानी तेंदुआ
ऊँचे दर्रे पर
खुली घासनी में बने
सुनसान विश्राम गृह की
ज़मीन से छत तक लम्बी
काँच की खिड़की
से झाँक
देखने तुम्हें
स्वर्गीय नींद में सोये...

फिर छोड़
पंजों के निशानों के तोहफ़े
परिक्रमा में
तुम्हारे देखने को अगली सुबह,
चला जायेगा
मुस्कुराते
तुम्हारे रोमाँच की वादी में!

Sunday, September 10, 2017

अब्दाली

आया है फिर
बार चौथी
लौट 1764 से
संग बलूचों के
अब्दाली
लिए
अबके
निहत्थों की फ़ौज
ढक सिर
माँगने
हरि के मंदिर में
ईलाही से माफ़ी,

मायूस है मग़र
बे इंतहा
देख खड़े
दरवाज़े पर
गुरु बख्शों की जगह
ये कौन से ग़ाज़ी!

क्यों कर?

मोड़ अमृत से मुँह
ज़हर का प्याला
उन्होंने उठाया क्यों कर?

वो कौन थे मुख़ातिब
दर ओ दरवेश
प्यासों ने पानी से मुँह
घुमाया क्यों कर?

रहने दे

बादशाह को बादशाह
दरवेश को दरवेश
रहने दे,

कोई विरला
हुआ जो दोनों,
ख़ुदा की कुदरत,

वर्ना सत्ता नशीन को
इतिहास तक रहने दे।