है
शक
ये शायद
बेबुनियाद
नहीं,
है
इलेक्ट्रिक
गिटार
मेरी
पीठ में,
रीढ़
नहीं,
विचारों
की
तरंगें
बजाती हैं
ऊँचा
सुरीला
मदमस्त
संगीत,
बाँधे
हैं
जैसे
मस्तिष्क
को
कुण्डलिनी
से
तारें,
सुरों
के
मणके
हैं
नीचे,
कुछ
और
नहीं।
देह
नहीं,
रूह
का
वाद्य यंत्र
है
शायद,
किसी
और
की
धुन है
ये,
मेरी
आवाज़
नहीं।
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