अटक गई है कहीं ज़िन्दगी की सुई, किसी ग्रामोफ़ोन की तरह,
तरसता है दिल रेडियो सी आज़ादी, तोड़ कर चखने को, हवा से, उमंगों के स्टेशन।
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