Tuesday, July 1, 2014

मछलियाँ

गली
में
बहती
बरसात
की वो
नन्हीं
नदी
ही थी
सतलुज
कागज़ की
कश्तियों की,

गोबिंद सागर
गली के
मोड़ पर
ही था,
जिस में
था
भर जाता
अक्सर
अथाह
खुशियों का
बाँध,
पकड़ते थे
जिसमें,
नंगे पैरों से
बचपन की
मछलियाँ।

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