गली में बहती बरसात की वो नन्हीं नदी ही थी सतलुज कागज़ की कश्तियों की,
गोबिंद सागर गली के मोड़ पर ही था, जिस में था भर जाता अक्सर अथाह खुशियों का बाँध, पकड़ते थे जिसमें, नंगे पैरों से बचपन की मछलियाँ।
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