Tuesday, March 11, 2014

कब्र

मिल गई है
मुझे
कब्र अपनी।
यहीं है
कहीं
इसी शहर,
ढूंढ़ लूँगा
थोड़ा थोड़ा
रोज़
निकाल
फ़ुर्सत।

पर
है यहीं
लग गया है
मुझे पता
पक्का।

अच्छा है
शहर
अच्छी है
आबो हवा,

भा गया है
रूह को
चाहता हूँ
रहना
यहीं
हमेशा।

करना मत
चिंता मेरी
रुकना मत
लिए मेरे,

बढ़ जाना
आगे
उस देश
दुनिया
जो बुलाए
तुम्हें
मार आवाज़ें
भविष्य से।

रहना
ख़ुशी से
करना काम
डटकर
मन चाहा।

करना मत
चिंता
मेरी,
होऊँगा
यहीं,

आ जाना
मिलनें
करे जब जी।

आओ गर तुम
मिलनें मुझे
निकाल वक्त
घबराना मत
गर न मिला
सोता
बिस्तर पर
सख्त़।

रहना रुके
करना
इंतज़ार
वहीँ
आ जाऊँगा
जल्द...

समझ जाना
गया होऊँगा
करनें सैर
जंगल के रस्ते,
या
बाज़ार
खरीदनें
ज़रूरी सामान,

देखनें
फिर
बच्चों को
दौड़ते
गेट तक
स्कूल से
बजनें पर
घंटी
या
करनें महसूस
पीड़ा,
देनें सांत्वना
मरीजों को
अस्पताल उसी,

पढ़ता होऊँगा
अख़बार
वही
बार तीसरी
चौराहे के
रीडिंग रूम,
या
होऊँगा
ऊँघता
बैंच पर
उसी
सेकता
जाड़ों की
धूप।

आ जाऊंगा
जल्द
करना
इंतज़ार
मत जाना।

लिख रहा हूँ
ख़त,
मिले तुम्हें कब
कौन जानें,
कि मिल गयी है
तुम्हारे पापा को
उनकी
कब्र,
यहीं
इसी शहर ।

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