साँसों की तितलियाँ
Friday, March 7, 2014
दरवाज़े
खड़काते रहे
वो
अक्षरों के
दरवाज़े,
खुलनें से
उन्हें
सरोकार न था,
वही थीं
घंटियाँ
उनकी
बजाते रहे
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