साँसों की तितलियाँ
Wednesday, July 24, 2013
बेरुख़ी
कर्ज़ न सही
एहसान ही सही
कुछ तो लिल्लाह दीजिये
इंकार ही सही।
वफ़ा न हो मुमकिन
जफ़ा नामंज़ूर
बेरुख़ी हो आसान
बेरुख़ी ही सही
नीयत
बला की ढूँढती है
नीयत बला को -
टालने वाली
उतारने वाली
रूठने वाली
गिटार
कौन सी गिटार खरीदूँ
जो बजानी आसान हो
जल्दी आ जाये
फिर सोचता हूँ
जो अंदर बजती है
बज रही है
बेहतर है
अच्छी है
Saturday, June 29, 2013
बारिश
बंद खिड़की पर
बाहर से पड़ती
बारिश
जब शीशे को
ज़ोर ज़ोर से धोती है,
अंदर
सूने
बंद कमरे में
अकेले
सूखे
बैठे मुझको
यादों से भिगोती है.
Saturday, April 20, 2013
वापसी
खुले बाल मेरे
फड़फड़ा रहे
ठण्डी चीखती हवाओं में
इस आसमानी चोटी पर
जैसे लहराता
उतावले जीवन का
दृढ़ ध्वज ।
आँखें हैं बंद
चेहरा है खुला
पूरा ।
धरती के ऊपर से
गुज़रते
उड़ते
पंजों में से उसके
मैं जो फिसल गिरा था कभी
गहरे जंगल में,
भटक
निराश
हताश
उदास हो
चढ़ आया हूँ
इस शिखर पर
इंतज़ार में उसी के॰॰॰॰॰
वो आए
ले जाये मुझे दबोच
अपने खोये शिकार की तरह।
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