साँसों की तितलियाँ
Wednesday, July 24, 2013
उदासी
जन्नत
में रहने वाले
जब जब
उदास हो जाते हैं,
जाकर
दोज़क हो आते हैं
चारा
सड़क किनारे
बैठी
क्या सोचती है
वो गाय?
कोई चारा नहीं
अगले जन्म
के इंतज़ार
के सिवा॰॰॰॰॰॰
बेताबी
भटके हुए
अभी
बहुत वक्त
तो हुआ न था,
फिर क्यों
ढूँढते हुए
बेताब मंज़िलें
मुझ तक
आ गयीं
दर्द
मारने से डरता हूँ
पत्थर आइने पे
ख़ुद को लगने से ज़्यादा
कहीं दर्द न हो
मेरे अक्स को
कारोबार
कौन मिलता है
कभी
कहीं
किसी को
गोया कारोबार के सिवा
लौटाना होगा
कभी कुछ लिया हुआ,
लेना होगा
कहीं कुछ
लौटाने के लिये।
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