Tuesday, February 4, 2014

बूँद

कई सागर
उंडेल कर
बनाया
हर बूँद को
उसने,
फिर
जी में आया
तो सागर
बूँद से
भर दिया

सुबह

लो
फिर मूँदता हूँ आँखें
सोता हूँ

गर
क़ुबूल हो
तो
नयी सुबह
फिर
जगाना मुझको |

बुत

बुतपरस्ती
जिसके गुलामों
को
कबूल कभी न थी

क्या गरज़
तराशा
मुझे
उस संगतराश नें?

Saturday, February 1, 2014

दरिया

रोज़ रोज़
दरिया बनना
मुश्किल था,
आज
पत्ती पर
ओस बन
गुज़ारा मैंने |

जाला

मेरे घर
के कोने मे
तुमने
जाला क्यों बुना?
मकड़ी से
मैंने पूछा |

मेरी दुनिया
के कोने में
तुमने घर
क्यों बनाया?
किसी नें
पीछे से
मुझसे पूछा