कई सागर उंडेल कर बनाया हर बूँद को उसने, फिर जी में आया तो सागर बूँद से भर दिया
लो फिर मूँदता हूँ आँखें सोता हूँ
गर क़ुबूल हो तो नयी सुबह फिर जगाना मुझको |
बुतपरस्ती जिसके गुलामों को कबूल कभी न थी
क्या गरज़ तराशा मुझे उस संगतराश नें?
रोज़ रोज़ दरिया बनना मुश्किल था, आज पत्ती पर ओस बन गुज़ारा मैंने |
मेरे घर के कोने मे तुमने जाला क्यों बुना? मकड़ी से मैंने पूछा |
मेरी दुनिया के कोने में तुमने घर क्यों बनाया? किसी नें पीछे से मुझसे पूछा