थी जिन्हें फ़ुर्सत शिकवा ए जफ़ा की नहीं था उन्हें वक्त ए उल्फ़त जब जब सदा दी ।
उनकी ज़ुबां पर मरहम ए दिल कुछ और होती, धड़क लेता कुछ और क्या क़यामत होती?
यूँ ही नहीं थी उल्फ़त मजबूरियों से, ज़रूर उल्फ़त की मजबूरियाँ रही होंगी ।
नश्तर छोड़ा है देखें अबके किधर जाये किसे लगे, हर बार हमहीं मिले हैं हमें ही लगा है
तेरी ज़मीन है, रहने दे, आसमाँ में कौन खुदा हो कौन जाने