Friday, April 11, 2014

मिट्टी

आया है
ख़्याल
अभी,
हूँ
मुस्कुरा रहा
ये जान,

बना हूँ
मिट्टी से
उसी
जिससे
बने थे
क्या क्या
कौन कौन
कभी
पहले भी।

हूँ
रोमाँचित
सोच कर,
बनेगा
और
क्या क्या
कौन
कब
कहाँ,

कैसा
मटका,
कैसी
सुराही,

मिट्टी से
इसी,

घूमते
चाक पर
धरती के,

किस
कुम्हार
के हाथ,

भरने
कौन सी
हवा
कौन सा
पानी

बुझाने
किस किस की
कौन सी
प्यास,

किस दहलीज़
किस बोड़
किस उजाड़

कहानी

आओ
बैठो
यहाँ
मेरे सामने
देखो ज़रा
मेरी तरफ़।

खोलूँ
काटूँ
तुम्हें
कलम की
धार से,
निकालूँ
अंदर से
तुम्हारे,
तुम्हारी
महकती
भीगी
नायाब
कहानी,
मेरी ज़ुबानी।

Sunday, April 6, 2014

किनारा

मेरे
बच्चे,
या अपनीं
मर्ज़ी
कर ले
या मेरी
सुन ले।

गर नहीं
तो
इतना ही
कर ले,
अपनी को
मेरी
या मेरी
को
अपनी
समझ ले।

कुछ तो
कर,
यूँ न
तड़प,
मेरे बच्चे,

मझधार
में न
रह
खड़ा,
किसी किनारे
तो
डूबले।

Friday, April 4, 2014

सुबह

सूरज,
जिस दिन
सदियों लम्बी
रात के
पिछले पहर,
वक्त के
तेल को जला,
बिन फूँक
ख़ुद ही
फड़फड़ा के
बुझोगे,
कौन सी
हसीन
सुबह
लाओगे,
कब लाओगे!

Tuesday, April 1, 2014

बैसाख

आ गई
फिर
विचारों की
बैसाख।

दिल है
बाग़ बाग़
देख
खरीफ़ कविताओं
की
लहलहाती
फ़सल।

चलो
ज़हन की मिट्टी
को
अब लेने दूँ
साँस,
छोड़ दूँ अकेला
करनें दूँ
आराम,
सोनें दूँ।

न डालूँ
उतावले अहसासों से
गर्भ का बोझ
इसकी झोली,
हल्के पाँव
ज़मीं को
कुछ देर तो
उड़नें दूँ।

उठे
फिर
जो सो कर
बाद दिनों,
परतें खोल
इसकी
विवेचन के
परिंदों को
आलोचना के
कीड़े चुगनें दूँ।

मिलाऊँ
तजुर्बे में
नवीनता की
खाद,
समझ का
रंग परतनें दूँ,
नया होनें दूँ।

उखाडूँ
जड़ता की
खरपतवार,
सहजता से
ख़ुद को
सींचनें दूँ।

उतरनें दूँ,
फिर,
नई दुनिया के
बीज इसमें,
रबी की
कवितायेँ
उगनें दूँ।