Monday, April 14, 2014

झोली

शुक्र
ख़ुदा का
हो गया
अहसास
फिर भी
कुछ
जल्द,

समेट
न
पाऊँगा
कायनात
सारी
झोले में
इस,

लो
छोड़ता हूँ
अभी
के अभी
उठाइगिरे
का काम,

ये उतारता हूँ
काँधे से
गलतफ़हमियों
और
मलकीयत
की
बोरी,

ये झाड़ता हूँ
ज़हन के
कपड़े,

ये सीधी कर
विचारों की
दुखती
झुकी
टेढ़ी
रीढ़,
सर उठा
बिन बोझ
बचे वक्त
चलता हूँ
जीता हूँ।

Sunday, April 13, 2014

आई

पेड़ों
के चूल्हे पर
पकाती थी
हाथों से
उतार
गर्म गर्म
खिलाती थी,
बुझाती थी
सदियों
की प्यास
कभी
कूओं की
सुराही से
कभी
नदियों की
बुक से
पिलाती थी।

करती थी
बादलों की
चुन्नी से
छाँव,
हवा की
फूँक से
सहलाती थी।

पहनाती
कभी
मखमली
घास की
चप्पल,
कभी
मिट्टी से
माँज
भटकन के चक्र
पैरों से
मिटाती थी।

धोती थी
पैर
ला ला के
दूर से
लहरें
बार बार,
पूरब की
हवाओं से फिर
सुखाती थी।

बिठाती
वादियों की
गोद,
खामोशिओं की
लोरियाँ
सुनाती थी।

रखती थी
निगाह
हर दम
चाँद सितारों
की हज़ार
आँखों से,
जलते सूरज
की नज़र से
रात भर
बचाती थी।

यतीम को
पालती थी
माँ से ज़्यादा,
कुदरत आई
तुम्हें
मैं
कभी
माँ कहूँ,
अब समझता हूँ,
तुम
चाहती थी!

Saturday, April 12, 2014

खलल

तुम्हारा
ही था
सर
झुकाता कैसे,
तुम्हारी ही
ज़ुबान,
माँगता कैसे?

देता
कैसे
टेक
तुम्हारे घुटनें,
फैलाता
कैसे
तुम्हारे ही
हाथ?

आ कर
तुम्हारे ही
घर,
चलकर
पैरों पर
तुम्हारे,
तुम्हारी ही
आँखों से
तुम्हें देख,
हूँ
सोचता
बस यही,

कहीं
हूँ तो नहीं
तुम्हारी ही
प्रार्थना!

कहीं
बन न जाऊँ
सबब
खलल का।

कहनें
करनें
होनें दूँ
तुम्हें
मुझमें,
रहूँ
खामोश
देखता
सुनता
मुस्कुराता
खड़ा
कोने।

पलकें

आज भी
झपककर
अपलक
करती हैं
गीला
बार बार
गोद में
बैठी
बुझी
आँखें,
वो पलकें
इस तरह,

जैसे
चूमती हो
माँ
बार बार
अपना
बच्चा
खोने के
बाद भी
कई सदियाँ ।

Friday, April 11, 2014

पैग़ाम

देखो
वो
दूर से
आता है
तेज़ तेज़
साइकिल पर
नामाबर*           (*डाकिया)
डाले
झोले में
कुछ
ख़ास।

जाओ
भाग
गाँव के
पार,
बुझाओ
आग,
जोड़
लाओ
वापस
वो
खुशनसीब
जाता था
जो
जहाँ से
इंतज़ार में
किसी
पैग़ाम के।