दुनिया
की
परात
को
उठाए
हैं
चलते
छ: अरब
कीड़े,
एक
मरता है,
दो
जुड़ते |
Monday, May 5, 2014
नदी
जो
है
नदी
की ज़िद,
कर
लेने दो
उसे,
बहने
मुड़ने
रुकने
चलने दो
वहीं से
वैसे ही
चाहे वो
जैसे...
न जाने
सागर से
उठ
बादलों
की कैद से
तलहटी में
दोबारा
फिर
यहाँ
कब
बरसे!
Sunday, May 4, 2014
ख़ामोशी
लेटा सा
बैठा हूँ
आरामदेह
कुर्सी पर
घर की
बालकोनी में
बंद कर
आँखें,
देखता
कानों से,
गुज़रती
आवाज़ों
के बिम्ब ।
क्या
सुकून भरा
मंज़र है,
कितनी
ख़ामोशी है ।
अलविदा
मान लो
आज
आज नहीं
बीस साल
बाद है,
हम सब
हैं
जा चुके
दूर दूर
अलग दिशा,
और
आज हैं
कर रहे
याद
बीस साल
पहले
का आज।
आओ
बैठें
साथ साथ
और करीब,
करें
ढेर सी
बातें
दिल खोल,
बितायें
जागें
साथ साथ
शाम
सारी
देर रात,
कहें
अलविदा
आज को
कल
सुबह ।
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