Friday, July 18, 2014

सरहद

एक
सरहद
ताउम्र
हमसे
पार
न
हुई,

रूहों
की
रियासत
थी,
रूह
पे
छोड़ दी।

निःशब्द

आवाज़ों
ने
पकड़ लिया
डाल
बाज़ुएँ
मेरे
कानों
से,

आँखों से
नज़ारों ने
जकड़
लिया,

ज़ुबान
पर
था
ताला
अचम्भे का,

रह
गया
मैं
खड़ा,
जड़,
निःशब्द ।

Thursday, July 17, 2014

नाम

धक्का
सा
लगा
ये
देखकर,
मेरे
नाम
का
कोई
और
भी है,

किसी
ने
आज
मुझको
मुझसे
चुरा
लिया |

इरादा

उस
दुनिया
के
दुःख का
इस
दुनिया
के
उत्सव
से
क्या?

वो
उसकी
ज़िद
है,

ये
मेरा
इरादा|

बदला

हज़ार
बरस
पहले का
बदला
अब
क्यों?

अगले
हज़ार
बरस का
फिर
रहन                 (गिरवी रखना)
क्यों?