एक सरहद ताउम्र हमसे पार न हुई,
रूहों की रियासत थी, रूह पे छोड़ दी।
आवाज़ों ने पकड़ लिया डाल बाज़ुएँ मेरे कानों से,
आँखों से नज़ारों ने जकड़ लिया,
ज़ुबान पर था ताला अचम्भे का,
रह गया मैं खड़ा, जड़, निःशब्द ।
धक्का सा लगा ये देखकर, मेरे नाम का कोई और भी है,
किसी ने आज मुझको मुझसे चुरा लिया |
उस दुनिया के दुःख का इस दुनिया के उत्सव से क्या?
वो उसकी ज़िद है,
ये मेरा इरादा|
हज़ार बरस पहले का बदला अब क्यों?
अगले हज़ार बरस का फिर रहन (गिरवी रखना) क्यों?