Friday, August 1, 2014

वजूद

क़दमों
की
आज़ादी
के लिए
इरादों
के मोज़ों
पर
पहनता हूँ
अवमानना के
जूते,
क्राँति
की टाँगों पर
खड़ा है
वजूद का
धड़।

सज़ा

देते हो
सज़ा
मुझको
कत्ल के
बरसों बाद,

कैसे
बताऊँ
कि
वो नहीं हूँ
मैं
पछताने
के बाद।

बारिश

कहाँ है
वो
रहमत की
मूसलाधार
बारिश
जो
अभी अभी
बरसी थी?

शायद
बह गई
सारी
रिसने को
वजूद की
जड़ों में,

छोड़
हमारे
पृष्ठ को
छूटने
दुआ-शिकायत
के
जाल से।

नमक

लाला जी!

बेटी
का जनम
क्रैडिट में
चढ़ाऊँ
या डैबिट
में,

ऐसेट में
दिखाऊँ
या
लायबिलिटी में,

होनहार
वफ़ादार
मुंशी
ने
डरते डरते
हाथ में
नमकदानी
पकड़
पूछा।

रात

कल रात
जो
पी थी
हमदम ने
चुपके से,
आज
चढ़ी है
रूह पर
उतरने पे।