क़दमों
की
आज़ादी
के लिए
इरादों
के मोज़ों
पर
पहनता हूँ
अवमानना के
जूते,
क्राँति
की टाँगों पर
खड़ा है
वजूद का
धड़।
Friday, August 1, 2014
वजूद
बारिश
कहाँ है
वो
रहमत की
मूसलाधार
बारिश
जो
अभी अभी
बरसी थी?
शायद
बह गई
सारी
रिसने को
वजूद की
जड़ों में,
छोड़
हमारे
पृष्ठ को
छूटने
दुआ-शिकायत
के
जाल से।
नमक
लाला जी!
बेटी
का जनम
क्रैडिट में
चढ़ाऊँ
या डैबिट
में,
ऐसेट में
दिखाऊँ
या
लायबिलिटी में,
होनहार
वफ़ादार
मुंशी
ने
डरते डरते
हाथ में
नमकदानी
पकड़
पूछा।
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