आज
मैंने
रास्ते में
दुकानदार से
क्रिकेट का
स्कोर न पूछा,
आज
मैंने
दुनिया की
हक़ीक़त को
याद रखा।
रोज़ शाम
लौटते समय घर
गुज़रता हूँ
जब भी
सामने से उस घर के,
आती है
आवाज़
रहरास के पाठ की
वेदों के उच्चारण की
या धम्मपद की,
बूझ नहीं पाता हूँ।
गुनगुना रहा होता है
दबी आवाज़ में
कोई...
किस मज़हब की
गाता है
प्रार्थना
पहचान नहीं पाता हूँ,
ख़ुदा का एहसास
उठता है मगर
जाना सा
सीने में...
बढ़ा लीजिये
चाय का दाम
कुछ और
मगर कप में
तनिक और तो डालिए,
हो तो सही
बदन में
वो एहसास
जिसकी तवक्को है।
पार्क में
शहीद लेफ़्टिनेंट के बुत
के सर की टोपी
जिस ऊँचाई पर थी,
था होता शुरू
उसी ऊँचाई से
बगल ही में खड़े
सियासतदान का
मरणोपरांत
पैर से सर तक का
पत्थर में सफ़र,
सियासत
यकीनन खड़ी थी
शहीदों के कन्धों पर।
आभार
विष्णु भगवान् का
जो
नहीं होते
अब
अवतरित
राजाओं की
देह में,
देते हैं
अब
यही
आशीर्वाद
बिन दिए
लोकतन्त्र को।