Friday, September 11, 2015

यक़ीनन

सूखे पत्तों
से हुआ
इस्तक़बाल,
कोई
मलाल नहीं,

यक़ीनन
फूल होते
गर
बहार होती!

ज़िंदा

उनके
साथ के
ज़िंदा हैं अभी,

दौर ही
गुज़रे हैं
याँ से,
ज़माने के निशानों में
वो ज़िंदा हैं अभी!

Friday, September 4, 2015

इत्मिनान

आपके
नफ़े
बेशक़
थे हमसे
कई गुना,

हमें
इसी का
था इत्मिनान
कि हमारा
शुभ लाभ
बड़ा था।

बुत

बुत आपके
बेशक़
काफ़िर
से थे,

चुनांचे
अल्लाह
की मर्ज़ी
से थे,
हमने छोड़ दिए।

यकीन

बहुत
अरमान
इस जनम् के
हमने
अगले पर
बा सुकून
छोड़ दिए,

अपनी रूह का
यहीं
भटकने का
पुरज़ोर
यकीन था
इतना।