सूखे पत्तों से हुआ इस्तक़बाल, कोई मलाल नहीं,
यक़ीनन फूल होते गर बहार होती!
उनके साथ के ज़िंदा हैं अभी,
दौर ही गुज़रे हैं याँ से, ज़माने के निशानों में वो ज़िंदा हैं अभी!
आपके नफ़े बेशक़ थे हमसे कई गुना,
हमें इसी का था इत्मिनान कि हमारा शुभ लाभ बड़ा था।
बुत आपके बेशक़ काफ़िर से थे,
चुनांचे अल्लाह की मर्ज़ी से थे, हमने छोड़ दिए।
बहुत अरमान इस जनम् के हमने अगले पर बा सुकून छोड़ दिए,
अपनी रूह का यहीं भटकने का पुरज़ोर यकीन था इतना।