दबे पाँव
मेरी आँखों के सामने
बदलता रहा
वक़्त
और मुझे
पता न चला,
यूँ
अय्यारी
न करता
तो कहाँ
बदलने देता!
दबे पाँव
मेरी आँखों के सामने
बदलता रहा
वक़्त
और मुझे
पता न चला,
यूँ
अय्यारी
न करता
तो कहाँ
बदलने देता!
ख़ुद ही
पकड़ा देते हो
बेक़द्रों को
भोलेपन में
डण्डा
ख़ुद ही पर
चलाने को,
सूचना का कर्फ्यू
कभी असहयोग आंदोलन सा
भी तो
लगाया करो!
मुर्गियों
की तरह हैं
कविताएँ,
कहाँ करती हैं यकीन
आती हैं पकड़ में
गर भागो पीछे!
बस
ज़हन के हाथ
रख खुले
गर चुप चाप चलो
राह अपनी
तो आती हैं पास
ख़ुद ब ख़ुद
उठा कलम!