Friday, January 1, 2016

अय्यारी

दबे पाँव
मेरी आँखों के सामने
बदलता रहा
वक़्त
और मुझे
पता न चला,

यूँ
अय्यारी
न करता
तो कहाँ
बदलने देता!

पीठ

उठाये था सारा आकाश
पीठ पर
वो इंसान,

जब तक नहीं देखा
किसी ने
उसके पैरों तले
क्या था!

गंगा

भव सागर में न डूबे
गंगा में डूबे,

पाश में न हुए क़ैद
मोक्ष में हुए!

कर्फ्यू

ख़ुद ही
पकड़ा देते हो
बेक़द्रों को
भोलेपन में
डण्डा
ख़ुद ही पर
चलाने को,

सूचना का कर्फ्यू
कभी असहयोग आंदोलन सा
भी तो
लगाया करो!

मुर्गियाँ

मुर्गियों
की तरह हैं
कविताएँ,
कहाँ करती हैं यकीन
आती हैं पकड़ में
गर भागो पीछे!

बस
ज़हन के हाथ
रख खुले
गर चुप चाप चलो
राह अपनी
तो आती हैं पास
ख़ुद ब ख़ुद
उठा कलम!