करता हूँ जब भी ख़ुद से कोई बात तो सोचता हूँ,
किससे हूँ कर रहा और कौन हूँ मैं!
कूड़ेदान में कब तक रहे कोई,
क्यों न हो साफ़, कहे शहर कोई।
रह चला है इस शहर से बाहर देखने को क्या कुछ जाते जाते,
पा कर भी कहाँ मिली दुनिया मुझे!
वो लौट आये इत्मिनान हमें,
हम होते हैं रुख़सत ऐतबार उन्हें।
कुछ और है तेरी उदासी का सबब,
होने दे वाज़े, ठहर, अभी उदास न हो।