Sunday, July 3, 2016

माँ

माँ
बहुत स्वादिष्ट थी
आपके हाथ की बनी
दाल
सब्जी
कढ़ी
और चने भी!

आपके
मन्दिर का
प्राँगण भी
आपकी गोद की तरह था
सुकून से भरा।

अलविदा

गया तो था मैं
किसी को
कहने
अलविदा,

शमशान से लौटा
मगर
"जल्द मिलूँगा"
कह के!

सुबह

एक रात
ऐसी
सो के उठ
कि सुबह
आसमानी हो,

जिस्म हो
रूह रूह,
रूह
जिस्मानी हो।

Friday, July 1, 2016

सचखण्ड

किन्नी कोल नें
सचखण्ड दे,
हुण,
तनखैय्या,

पक्कियाँ शक्लाँ
दे पिच्छे
कच्चे किन्ने।

असीस

तेरी दित्ती
असीस
ताँ नहीं
तेरी हाय
ज़रूर लग्गी मैनूँ,

फेर सोचदाँ
जद नहीं लग्गी असीस
किवें लग सकदी
हाय किसेनूँ।