माँ बहुत स्वादिष्ट थी आपके हाथ की बनी दाल सब्जी कढ़ी और चने भी!
आपके मन्दिर का प्राँगण भी आपकी गोद की तरह था सुकून से भरा।
गया तो था मैं किसी को कहने अलविदा,
शमशान से लौटा मगर "जल्द मिलूँगा" कह के!
एक रात ऐसी सो के उठ कि सुबह आसमानी हो,
जिस्म हो रूह रूह, रूह जिस्मानी हो।
किन्नी कोल नें सचखण्ड दे, हुण, तनखैय्या,
पक्कियाँ शक्लाँ दे पिच्छे कच्चे किन्ने।
तेरी दित्ती असीस ताँ नहीं तेरी हाय ज़रूर लग्गी मैनूँ,
फेर सोचदाँ जद नहीं लग्गी असीस किवें लग सकदी हाय किसेनूँ।