एम बी ए!
व्यापार करेगा?
मुफ़्त में बेचेगा
क्रोध
या
मंहगे में देगा?
चढ़ी दोपहर
स्कूल में
खोलते हैं जब
टिफ़न
बच्चे,
बंधा पाते हैं
फिर
सुकून की सुबह का
ताज़ा टुकड़ा,
माँ वालों
के नित में
सूरज कई बार है चढ़ता।
लो यहाँ अपने सफ़र को
देता हूँ विराम,
थक कर चूर मगर बेहद ख़ुश
रूह को आराम देता हूँ,
कह देना ज़माने को
बड़ा शुक्रगुज़ार था मैं,
उसके हर मन्ज़र को
तहे दिल से सलाम करता हूँ,
था मैं अलबत्ता
किसी और मिट्टी का,
सो इस मिट्टी को वापस बा अदब
साज़ ओ सामान करता हूँ!
हो
एक ऐसी भी महफ़िल
जहाँ
न शम्मा, न परवाना हो,
पिघल पिघल के
जले
मेरा ही वजूद,
तेरी ही रूह को
नज़ारा हो!