उड़ने दूँ आसमान में, मैं चलूँ,
कब तक बच्चों के गुब्बारों को पेड़ का तना बन पकड़े रखूँ!
मेरी ग़ैर मौजूदगी में भी मिल लेते हैं मुझसे घर आने वाले,
क्या क्या बता देती हैं उन्हें मेरे बारे मेरे कन्धों की शेल्फ़ पर पड़ी किताबें मेरी...
उड़ती पानी की टंकियाँ ये रहमतों के बादल,
औंधी पड़ी बिना पैंदे की ये इन्सां की बाल्टियाँ...
मत पूछ अपने बारे में मेरे ख़्याल,
ख़ुद की बाबत भी बेबाक़ ओ आला नक़ीद हूँ मैं।
उप कुल पतियों की सति प्रथा पर हतप्रभ क्षुब्ध है आज के हर राममोहन की रूह, एक महाराजा की ताजपोशी के घटनाक्रम पर शर्मसार है लोकतन्त्र के मत का हर राजा।