Wednesday, April 19, 2017

आँख मिचौनी

सपनों की दुनिया
कहीं यही तो नहीं?

आँख मिचौनी खेलती
मुखौटे के पीछे तो नहीं!

भोजन

टी वी की प्लेट में
मस्तिष्क के डाइनिंग टेबल पर
आखों के हाथ
झट परोस देता है
सोशल मीडिया का
नौकर
कलेजा मूँह को लाती ख़बरें
ठीक भोजन के वक़्त...

स्वर्ग के आधे रास्ते

ज़मीन से
उसने
कोई सरोकार न रखा,
सिवाय
उस मोटे पेड़ की जड़ों का
जिसके तने पर
बनाया उसने
वो ट्री हाउस
स्वर्ग के आधे रास्ते,
लिए साथ
यक्ष के अंतिम सवाल वाला
साथी।

Saturday, April 15, 2017

तितली

दिया था
जन्म
जिस तितली को
आपने,

सूख गए हैं
अब
उसके
रंग,

फड़फड़ा अपने पंख
चाहती है
अब उड़ जाना
बन्द क़िताब से उस,

आ
ढूँढ
खोलो
माज़ी का वही वर्क़,
कर जाओ आज़ाद...

ज़िंदा

कुछ दिन तो
रहें
पिता
ज़िंदा,
कि बच्चे के ज़हन में
ता-उम्र रहें।