Sunday, May 28, 2017

इंतज़ार

आदि मानव
इंतज़ार में है
कि परिष्कृत मानव
आपस में लड़ मरे
और उसे
वापस मिले
उसकी धरती,
सुख की साँस ले
कायनात,
हो इक
भयावह ख़्वाब की
इति।

Friday, May 12, 2017

बात

बनने के लिए बने
तो क्या बने,
बनते बनते बनो
तो कोई बात बने!

Tuesday, May 9, 2017

दुनिया

आती रहे
मुझ तक
उसकी आवाज़,
शक़्ल ओ सूरत
दरीचों से
गैर इरादतन
दिखती रहे,

रहे मगर
एक बाज़ू के फ़ासले पर
ये दुनिया
और बसती रहे।

पैकेज

पूछते हैं वो
कि कितने लाख का
है पैकेज,

अभी अभी
जलते देखा
एक ख़ामोश पैकेज,
सड़क किनारे
चन्दन पर,
मुफ्त का था!

Friday, April 21, 2017

दस्वन्ध

दस्वन्ध
हराम दी कमाई 'चों नहीं
हलाल दी कमाई विचों,
पैट्रोनाइज़्ड डेरेयाँ नूँ नहीं
ज़रूरत मन्दाँ नूँ,
मार्केटिंग वाँग नहीं
गिण के नहीं...