छुपा कर
रखे थे जो
शहर के
शर्मिंदा हिस्से
सड़कों की
पैनी नज़रों से
आपने,
रेल की पटड़ियों के
किनारे
ख़ुद को ढकते
लावारिस मिले।
छुपा कर
रखे थे जो
शहर के
शर्मिंदा हिस्से
सड़कों की
पैनी नज़रों से
आपने,
रेल की पटड़ियों के
किनारे
ख़ुद को ढकते
लावारिस मिले।
क़िस्मत की
वो ज़िद
कि यूँ ही रहेगी,
और हमारा
वो सरकश* (defiant)
राद ए अमल** (reaction)
फ़ुर्सत में
वो हिमाकतें
दोनों को
याद रहेंगी...