हज़ार चाहा कि दबे पाँव गुज़र जायें उस दहलीज़ से,
गुज़र गुज़र कर उसी रहगुज़र से गुज़रना पड़ा।
आई तो ज़रूर वो मन्ज़िल उस सफ़र के बाद,
हाय उस सफ़र को किस किस मुक़ाम से गुज़रना पड़ा।
हज़ार चाहा कि दबे पाँव गुज़र जायें उस दहलीज़ से,
गुज़र गुज़र कर उसी रहगुज़र से गुज़रना पड़ा।
आई तो ज़रूर वो मन्ज़िल उस सफ़र के बाद,
हाय उस सफ़र को किस किस मुक़ाम से गुज़रना पड़ा।
उग आए हैं हर तरफ़ ज़हरीले विचारों के कुकरमुत्ते,
ये कैसी हुई है तेज़ाब की बारिश अब के!
उभर उभर कर आये हैं चरित्र सब के,
ये किस किस के उतरे हैं हिजाब अब के!
उम्र की शरद में
ओढ़े स्नेह की मुस्कान
लिए आँखों में टिमटिमाते नक्षत्रीय दीये,
चेहरे के पीछे से झाँकता
यह कौन है हमारे नभ में
हम से जुदा,
भरता है ख़ुद का दम
हमारी ही साँसों से,
भले एक
भरी दुनिया सा लगता है!
ज़रा
सुबह की सीढ़ियाँ चढ़
कौतुहल की मुंडेर पर
देखो तो
कल रात जलाये दीये
अभी भी हैं जल रहे
या बुझ चुके?
यदि तेल की इति पर
हैं बत्तियाँ ख़ामोश हो चुकी
समझ लेना
बेहिसाब मुबारकों वाली
तुम्हारी दुनिया की दीवाली
फिर एक बरस को है
गुज़र चुकी।
लगे हाथ
फिर
झाँक देख लेना
ख़ामोशी पसरे दिल की बाम पर
क्या है अभी भी जलता
उम्मीद, सहजता, शुक्र का दीया?
यदि है अभी भी वो
मद्धम लौ में मुस्कुराता टिमटिमाता,
बिन बाती, बिन तेल,
समझ लेना
तुम्हारे जीवन की दीवाली
अभी तो हुई है शुरू
या है चिरजीवी, जारी!
ਰੂਹ ਦੇ ਕੰਨ ਲਾ
ਧਿਆਨ ਨਾਲ ਸੁਣੋ,
ਕੀ ਕਹਿੰਦਿਆਂ ਨੇਂ
ਖੂਹ ਦਿਆਂ
ਹੂਕਦਿਆਂ ਲਾਸ਼ਾਂ,
ਪੁੱਛਦਿਆਂ ਨੇਂ
ਸ਼ਾਇਦ
ਕੀ ਖੁਸ਼ ਹਨ ਵਸਦਿਆਂ
ਸਾਡੇ
ਦੇਸ਼ ਦਿਆਂ
ਆਉਂਦਿਆਂ ਨਸਲਾਂ!
ਕਰੋ ਜਿਗਰਾ
ਮਾਰੋ ਝਾੱਤੀ
ਜਲਿਆਂਵਾਲਾ ਖੂ ਵਿਚ ਲੁੱਕੀ
ਵੇਖੋ
ਦੇਸ਼ਭਕਤਾਂ ਦੇ
ਬਲੀਦਾਨ ਦੀ ਘਾਟੀ,
ਕਰੋ ਹੌਸਲਾ,
ਫੜ ਬੱਚਿਆਂ ਦਿਆਂ ਉਂਗਲਾਂ
ਚੁੱਕ ਗੋਦੀ
ਜਿਗਰ ਦੇ ਟੋਟੇ,
ਮਾਰਿਏ ਛਾਲਾਂ
ਇਕ ਵਾਰੀ ਫ਼ੇਰ,
ਮੰਗੇ ਕੁਰਬਾਨੀ
ਮਾਰ ਮਾਰ ਹਾਕਾਂ,
ਏਸ ਦੇਸ਼ ਦੀ
ਮਾਂ-ਮਈ ਮਾਟੀ।