एक एक
दो दो
चन्द
वार
तो कई राहगीरों नें किये थे,
अब कहाँ कहाँ जाये
ज़ख़्मी मुर्दा
क़ातिल ढूँढने!
क्यों न
ज़ख्मों के रुक्कों में
मनःस्पर्श से
बूझे उनका रूहानी पता
और
मोक्ष के लिए
धन्यवाद कहे।
Sunday, September 8, 2019
धन्यवाद
Sunday, March 24, 2019
आज फिर
आज फिर
दुनिया पीछे छूट रही थी
और मैं
मन्ज़िल की ओर
रफ़्तार से
था बढ़ रहा,
आज फिर
अतीत को मायूस किये बिना
शताब्दी में
मुझे
सीट थी मिली
उल्टी दिशा की...
Thursday, January 31, 2019
सफ़र
हज़ार चाहा कि दबे पाँव गुज़र जायें उस दहलीज़ से,
गुज़र गुज़र कर उसी रहगुज़र से गुज़रना पड़ा।
आई तो ज़रूर वो मन्ज़िल उस सफ़र के बाद,
हाय उस सफ़र को किस किस मुक़ाम से गुज़रना पड़ा।
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