ਆ
ਮਿੱਟੀ 'ਚ ਪੈਰ ਪਾ
ਖਿੜੀਏ
ਮਹਕੀਏ
ਠਹਿਰੀਏ
ਸਾਹ ਲਈਏ,
ਕਿੱਥੇ ਰੁਲਦੀ ਏਂ
ਸਾਹੋ ਸਾਹ
ਬੰਨ ਪੈਰਾਂ 'ਚ ਚੱਕਰ
ਨਸਲੇ
ਮੇਰੀ ਮਿੱਟੀ ਦਿਏ...
एक एक
दो दो
चन्द
वार
तो कई राहगीरों नें किये थे,
अब कहाँ कहाँ जाये
ज़ख़्मी मुर्दा
क़ातिल ढूँढने!
क्यों न
ज़ख्मों के रुक्कों में
मनःस्पर्श से
बूझे उनका रूहानी पता
और
मोक्ष के लिए
धन्यवाद कहे।
आज फिर
दुनिया पीछे छूट रही थी
और मैं
मन्ज़िल की ओर
रफ़्तार से
था बढ़ रहा,
आज फिर
अतीत को मायूस किये बिना
शताब्दी में
मुझे
सीट थी मिली
उल्टी दिशा की...