कुत्तों की क़िस्मत को सलामत हैं
न जाने कितने मालिक,
उनकी रोज़ी रोटी
रोटियों को पकाने और खाने वाले परिवार,
बची रोटियों की बरकतें
बची रोटियाँ रखने को डयोढियाँ,
डयोढियों को छाँव देती छतें,
छतों को सलामत रखती
कुत्तों की आस
की दीवारें!
कुत्तों की क़िस्मत को सलामत हैं
न जाने कितने मालिक,
उनकी रोज़ी रोटी
रोटियों को पकाने और खाने वाले परिवार,
बची रोटियों की बरकतें
बची रोटियाँ रखने को डयोढियाँ,
डयोढियों को छाँव देती छतें,
छतों को सलामत रखती
कुत्तों की आस
की दीवारें!
दोनों थे मज़दूर
पर एक नहीं था,
मुश्किलों में था दोनों का जीवन
दुःखी मगर एक नहीं था,
थे दोनों वक़्त के मारे
मुरझाया एक था दूसरा नहीं था,
था एक बस झुझारू इंसान,
दूसरा केवल इतना नहीं था,
मुस्कुराता था दिन भर
देख इलाही की मर्ज़ी,
"ख़ुदा का बन्दा" ख़िताब कम तो नहीं था!
एक एक
दो दो
चन्द
वार
तो कई राहगीरों नें किये थे,
अब कहाँ कहाँ जाये
ज़ख़्मी मुर्दा
क़ातिल ढूँढने!
क्यों न
ज़ख्मों के रुक्कों में
मनःस्पर्श से
बूझे उनका रूहानी पता
और
मोक्ष के लिए
धन्यवाद कहे।