Wednesday, February 25, 2026

सलामत

 कुत्तों की क़िस्मत को सलामत हैं 

न जाने कितने मालिक, 

उनकी रोज़ी रोटी 

रोटियों को पकाने और खाने वाले परिवार, 

बची रोटियों की बरकतें 

बची रोटियाँ रखने को डयोढियाँ, 

डयोढियों को छाँव देती छतें, 

छतों को सलामत रखती 

कुत्तों की आस 

की दीवारें!

"ख़ुदा का बन्दा"

 दोनों थे मज़दूर 

पर एक नहीं था, 


मुश्किलों में था दोनों का जीवन 

दुःखी मगर एक नहीं था, 


थे दोनों वक़्त के मारे 

मुरझाया एक था दूसरा नहीं था, 


था एक बस झुझारू इंसान, 

दूसरा केवल इतना नहीं था, 


मुस्कुराता था दिन भर 

देख इलाही की मर्ज़ी, 

"ख़ुदा का बन्दा" ख़िताब कम तो नहीं था!

Wednesday, November 6, 2019

अक्स

कहीं जूते,
कहीं कलम
कहीं कलम के नफ़े जैसा,

किसी का ब्रेड अंडे दूध
किसी का
कुर्सी मेज पलंग जैसा,

टी वी फ्रिज मोबाइल
कहीं कपड़े लत्ते गलाबन्द जैसा
मन्यारी
कहीं पंसारी
दारोगा
कहीं भिखारी जैसा,

रिआया
उसकी हुक्मरानी,
भोगी
कहीं संसारी जैसा,

जिस जिस काम में
जो था गिरफ़्त,
मिला उसका अक्स
उसी नक्श जैसा।

Wednesday, October 16, 2019

ਮਿੱਟੀ 'ਚ ਪੈਰ

ਆ
ਮਿੱਟੀ 'ਚ ਪੈਰ ਪਾ
ਖਿੜੀਏ
ਮਹਕੀਏ
ਠਹਿਰੀਏ
ਸਾਹ ਲਈਏ,

ਕਿੱਥੇ ਰੁਲਦੀ ਏਂ
ਸਾਹੋ ਸਾਹ
ਬੰਨ ਪੈਰਾਂ 'ਚ ਚੱਕਰ
ਨਸਲੇ
ਮੇਰੀ ਮਿੱਟੀ ਦਿਏ...

Sunday, September 8, 2019

धन्यवाद

एक एक
दो दो
चन्द
वार
तो कई राहगीरों नें किये थे,
अब कहाँ कहाँ जाये
ज़ख़्मी मुर्दा
क़ातिल ढूँढने!
क्यों न
ज़ख्मों के रुक्कों में
मनःस्पर्श से
बूझे उनका रूहानी पता
और
मोक्ष के लिए
धन्यवाद कहे।