शायद इसी सबब से
उठता है
आये दिन
शहर में कोई न कोई,
जायें बीस पचास साथ
देखने
अंतिम सच्चाई,
याद रहे।
शायद इसी सबब से
उठता है
आये दिन
शहर में कोई न कोई,
जायें बीस पचास साथ
देखने
अंतिम सच्चाई,
याद रहे।
कुत्तों की क़िस्मत को सलामत हैं
न जाने कितने मालिक,
उनकी रोज़ी रोटी
रोटियों को पकाने और खाने वाले परिवार,
बची रोटियों की बरकतें
बची रोटियाँ रखने को डयोढियाँ,
डयोढियों को छाँव देती छतें,
छतों को सलामत रखती
कुत्तों की आस
की दीवारें!
दोनों थे मज़दूर
पर एक नहीं था,
मुश्किलों में था दोनों का जीवन
दुःखी मगर एक नहीं था,
थे दोनों वक़्त के मारे
मुरझाया एक था दूसरा नहीं था,
था एक बस झुझारू इंसान,
दूसरा केवल इतना नहीं था,
मुस्कुराता था दिन भर
देख इलाही की मर्ज़ी,
"ख़ुदा का बन्दा" ख़िताब कम तो नहीं था!