Saturday, April 20, 2013

वापसी

खुले बाल मेरे
फड़फड़ा रहे
ठण्डी चीखती हवाओं में
इस आसमानी चोटी पर
जैसे लहराता
उतावले जीवन का
दृढ़ ध्वज ।

आँखें हैं बंद
चेहरा है खुला
पूरा ।

धरती के ऊपर से
गुज़रते
उड़ते
पंजों में से उसके
मैं जो फिसल गिरा था कभी
गहरे जंगल में,

भटक
निराश
हताश
उदास हो
चढ़ आया हूँ
इस शिखर पर
इंतज़ार में उसी के॰॰॰॰॰

वो आए
ले जाये मुझे दबोच
अपने खोये शिकार की तरह।

Saturday, February 23, 2013

आदिमानव

कल शाम
मैनें एक आदिमानव देखा ।

सुना था
आदिमानव
नग्न होता है ।

लम्बे उलझे बाल॰॰॰॰॰॰॰
नंगे पाँव
हाथ में पत्थर की शिला॰॰॰॰॰
गंदे दाँत
देह से बदबू
मुँह में मांस॰॰॰॰॰
प्राचीन सोच
जानवर तासीर
शिकारी प्रवृत्ती
घर की जगह माँद और कंदरा
और उस में भरी
माँस और मदिरा ।

आज
उसे देखा
तो पल भर
मैं धोखा खा ही गया ।

हाथ में मोबाइल
चमकते दाँत
बदन से खुशबू
मुँह में सिग्रेट॰॰॰॰॰

आज तो धोखा खा ही जाता
आदिमानव पहचान न पाता
अगर उसके पास न जाता
बहुत करीब से भाँप ना पाता॰॰॰॰

कपड़ों तले नग्न चरित्र
खोखला जीवन, सोच विचित्र
खुश्बू ढके मरे विचार
हँसी से दबी चीख पुकार ।

प्राचीन सोच
जानवर तासीर
शिकारी प्रवृत्ती॰॰॰॰

घर ही बना माँद और कंदरा
उस में भरी
माँस और मदिरा ।

कल शाम
मैनें आदिमानव देखा ।

सही सुना था
आदिमानव
नग्न होता है ।

बस स्टाप


मत डराओ मुझे
धरती के खत्म होने
की खबरों से॰॰॰

धूमकेतू के टकराने
जीवन खत्म होने की बातों से॰॰॰

प्रलय के आने
और शीत युग की शुरुआत से॰॰॰

मैं नहीं डरता
फर्क नहीं पड़ता
मुझे ।

बस ५ मिनट पहले
बता देना मुझे,
चंद कागज़
एक कलम
झोले में डाल
नंगे पाँव
पास के चौराहे
के बस स्टाप पर
तैयार मिलूँगा ।

उंगली


नन्हे बाएँ हाथ से
सड़क के दरिया को लाँघते
चौराहे पर
मगरमच्छ की तरह
उसकी ओर बढ़ते
कारों ट्रकों और बसों के झुण्ड को
उसनें रोकने की बहुत कोशिश की
॰॰॰॰॰वो नहीं रुके।

डरी
सहमी सी
वो बच्ची
रो ही पड़ती,
लाल बत्ती से झुंझलाई गुस्साई गाड़ियों
से घबरा ही जाती
अगर उसके
दायें हाथ में
उसके प्यारे पापा
के हाथ की
वो छोटी सी
उंगली न होती ।

वादा

"आऊँगी
ज़रुर
एक दिन,
बैठूँगी
तापूँगी आग
तुम्हारे साथ
देर रात ।

कहूँगी बातें
दिल खोलकर
सालों की
करुँगी यादें ताज़ा
बताऊँगी राज़
मन के
अनकहे
अनसुने ।

खाऊँगी
तुम्हारे हाथों से
जो खिलाओगे
पिलाओगे ।

देखूँगी छत को
बंद आँखों से
रात भर
लेट कर
जहाँ लिटाओगे ।

और सुनूँगी
खामोशी से
चुपचाप जो कहोगे
बैठकर बगल में
सारी रात
कुरेदते
यादों की राख़ ।

आऊँगी
ज़रुर
एक दिन,
बैठूँगी
तापूँगी आग
तुम्हारे साथ
देर रात,
मगर आज नहीं ।

आज भी
हूँ जल्दी में,
कहीं जाना है
कुछ काम है
ज़रूरी
बाकी ।"

सुबह सुबह
शहर के बाहर वाली सड़क पर
अंतिम धाम
के गेट
के सामने से
गुज़रते हुए
मेरे अंदर बैठे
किसी ने
किसी से
पीछे मुड़
कहा
मैंनें सुना ।