आभार
विष्णु भगवान् का
जो
नहीं होते
अब
अवतरित
राजाओं की
देह में,
देते हैं
अब
यही
आशीर्वाद
बिन दिए
लोकतन्त्र को।
आभार
विष्णु भगवान् का
जो
नहीं होते
अब
अवतरित
राजाओं की
देह में,
देते हैं
अब
यही
आशीर्वाद
बिन दिए
लोकतन्त्र को।
आसमान में
मत बिठा
ख़ुदा अपना
कि अंतिरक्ष से
तेरे महल
दिखाई ही न दें
उसे
धूमकेतू
गिराने से पहले,
रख
उसे
अपनी
दीवारों के
बीचों बीच,
भले
तेरा
कुछ न छिपे।
हलवाई जी,
देना
ताज़ा समोसा
और गर्म जलेबी
पलेट की बजाय
पुरानी अख़बार
के टुकड़े पर ही
रख,
चार
छूटी
खबरें ही पढ़ लूँ
चाय की चुस्कियों
के साथ।
लौटाना ही था
क़र्ज़
मुझे
तो नाहक
इतनी देर क्यों!
नज़रें चुराने के फिर
इलज़ाम क्यों,
एक ज़मीर के
दस बार
क़त्ल का क्या!
छोटू
अब
छोटू नहीं रहा था,
हो गया था अब
चौदह लीटर के कुक्कर से भी
ऊँचा,
माँज सकता था
हाथों के माँजे से
ढाबे का
बड़े से बड़ा
बर्तन,
भरने
मुठ्ठी से छोटा
सिकुड़ा पेट।