संवारकर बाल कंघी से तूने मंशा जताई है,
सुलझाना चाहता है तू सब उलझनों के खम, निराशा उक्ताई है|
यही सोच कर उस मज़दूर औरत ने पीठ पर लादी पाँच पोटलियों को धीरे से उतारा पटका नहीं,
उन्हीं में से एक में कहीं था बच्चा उसका।
ले सम्भाल अपना निज़ाम, मेरा त्यागपत्र पकड़,
स्वरोज़गार भला तेरी नौकरी से, दुनिया!
ज़िंदगी का ब्राण्ड मेगापिक्सेल रैम स्क्रीन साइज़ फ़ीचर्स न बता, इनसे करेगा क्या ये समझा!
माफ़ करना मेरे दोस्त, वो जंग मेरी न थी,
मौत तो मेरी थी यकीनन, वजह मेरी न थी।