Friday, July 31, 2015

राय

हौले से
बता दे
ख़ुद को
अपनी समझ की
राय,

क़ायनात
कहीं सुन न ले,
हंस न दे।

Wednesday, July 29, 2015

कहाँ

ईश्वर
क्यों नहीं था
तू
उन
कंदराओं में
जहाँ मैं
ढूँढ़ता था,

कब से
था
उन मदिरालयों में
जहाँ मैं
छुपा था?!!

मजबूरी

याक़ूब
तू अब
कईयों की
सियासी
मजबूरी है,

तेरे
ज़िंदा रहने का है
तक़ाज़ा,
तेरा मरना भी
ज़रूरी है।

दवात

स्याही
की दवात से
उसके जिस्म में
हर गुज़रता
नज़रों की कलम डुबा
लिखता रहा
अपने दामन पर
मजबूर ज़हन का
हलफ़नामा,

वो
खड़ी रही
चौराहे पर
वर्दी की
दीवार में|

इत्मिनान

जा पतंग,
आसमानों में
उड़,

ज़मीन को
इत्मिनान है
तेरी डोर से,
तू कहीं भी जा!