Sunday, August 30, 2015

की? क्यों?

नुक़सान
हो हो के वी
क्यों
फ़ायदा
हो रेहै?


की
हो रेहै,


क्यों
हो रेहै!

सोच रेहाँ

सोच
रेहाँ
ऐ जिस्म
कद तक
चलेगा?

सोच
रेहाँ
इस तों
बाहर
मैनूँ
किवें
लगेगा?

सोच
रेहाँ
फ़ेर
की
सोच्या कराँगा?

सोच
रेहाँ
फ़ेर
सोच
पाँवाँगा
वी या नहीं?

कहाँ

इस
जिल्द
से निकले
सफ़े
अब
कहाँ होंगे?

ख़ाली
दवातों
सूख़ी कलमों
के हर्फ़ उठाये
कहाँ उड़े
गले
गुमे
दबे होंगे!

आज़ाद

दरवाज़े
बहुत
हुए बन्द,
हम
क़ैद
भी हुए,

दीवारों को
गले लगा,
फिर भी
हम
उस पार
आज़ाद हुए!!!

Sunday, August 23, 2015

उमर

किते
पै न जाण
गश
मैनूं
यकदम वेख़ के
बुढ़ापा
अपणा,

इक इक दिन
करके
रब्बा
उमर दराज़ करीं!