Monday, February 29, 2016

भटकन

भटकन तेरी
कहीं
पहुँच जाने का
पैग़ाम देती है,

तू
कहाँ है
पूछ तो ज़रा
रास्तों के
वादों से!

Saturday, February 27, 2016

आग

इतने की
चीज़ न थी
जितने की
बद्दुआ होती,

हमने कर दिया
मुआफ़ उसे
पेश्तर की
धुएँ की आह से
आग उठती।

समझदार

न होता ठाना
तो बात
कुछ और थी

हमने
खाई थी
जीने की क़सम
मौत समझदार थी
जानती थी।

मुख़ातिब

न छेड़ा
ज़िन्दगी नें
मुझे,
जब तक
उलझा था मैं,

ज़रा सुलझा
तो मुझसे
मुख़ातिब हुई।

ज़िद

किसी
सरफिरे की ज़िद थी
जो यहाँ हूँ मैं,

मेरे कहे में
कब थी
रवानी मेरी।