भटकन तेरी कहीं पहुँच जाने का पैग़ाम देती है,
तू कहाँ है पूछ तो ज़रा रास्तों के वादों से!
इतने की चीज़ न थी जितने की बद्दुआ होती,
हमने कर दिया मुआफ़ उसे पेश्तर की धुएँ की आह से आग उठती।
न होता ठाना तो बात कुछ और थी
हमने खाई थी जीने की क़सम मौत समझदार थी जानती थी।
न छेड़ा ज़िन्दगी नें मुझे, जब तक उलझा था मैं,
ज़रा सुलझा तो मुझसे मुख़ातिब हुई।
किसी सरफिरे की ज़िद थी जो यहाँ हूँ मैं,
मेरे कहे में कब थी रवानी मेरी।