वो जो एक शिकवा था हमें आपकी बेरुख़ी से,
आपके ख़ुद ही पर देखे जो तसदीहे तो पस-ए-मन्ज़र आया!
ज्ञान कहीं अहम् बन न जाए,
उस दरकिनार ज़र्रे में कहीं दुनिया खो न जाये।
दुनिया जितनी बड़ी है दुनिया तो क्या?
ज़र्रा ज़र्रा क़ैद है ज़र्रे ज़र्रे में!
बदले दृष्टिकोण से गर इतनी मुख़्तलिफ़ थी दुनिया, क्यों न दुनिया को पहले बदला हमनें!
चलो अन्जाम से करते हैं इस बार आग़ाज़,
भूल कर ख़ुद को ख़ुद ही से हैं मिलते!