Tuesday, May 31, 2016

शिकवा

वो जो
एक शिकवा था हमें
आपकी
बेरुख़ी से,

आपके
ख़ुद ही पर
देखे जो
तसदीहे
तो पस-ए-मन्ज़र आया!

ज्ञान

ज्ञान
कहीं अहम्
बन न जाए,

उस
दरकिनार
ज़र्रे में
कहीं दुनिया
खो न जाये।

बड़ी

दुनिया जितनी
बड़ी है
दुनिया
तो क्या?

ज़र्रा ज़र्रा
क़ैद है
ज़र्रे ज़र्रे में!

पहले

बदले
दृष्टिकोण से
गर
इतनी मुख़्तलिफ़ थी
दुनिया,
क्यों न
दुनिया को
पहले
बदला हमनें!

इस बार

चलो
अन्जाम से
करते हैं
इस बार
आग़ाज़,

भूल कर
ख़ुद को
ख़ुद ही से
हैं मिलते!