Monday, October 31, 2016

लैम्पपोस्ट

नस्लों
के फूलों
की डण्डियों से
हटाये जो भारी बस्ते
तो कुबड़े निकले,

सूरजमुखी
की कुदरत
के वारिस
समझदार
मजबूरियों के
लैम्पपोस्ट निकले।

Saturday, October 29, 2016

कमी

एक और एक
ग्यारह हुए
तो मुश्किलें
नौ दो ग्यारह हुईं,

उन्नीस बीस
कि कमी थी
इरादों में,
पूरी क्या हुई
कि पौ बारह हुई!

दुआ

दिली ख़्वाहिश है
ज़माने की
कि वहाँ पहुँचे
जहाँ जाता है!

कोई बदल दे
जहन्नुम को
जन्नत में
दुआ है मेरी!

हाज़िर

तेरे दर से
गर हूँ
ग़ैरहाज़िर
तो कहीं तो
हाज़िर हूँ,

तू भी तो
मुफ़लिसों के ख़ैरख़्वाह!
कभी
कहीं से हो ग़ैरहाज़िर
कहीं हाज़री दे!

लिहाज़

कपड़े पहन कर तो
नाचा कर
ऐ पैसे!

रस्मन
अभी भी है
सभ्य
ये समाज,
कुछ तो
लिहाज़ कर!