स्वयं पर
शोध करवाने हेतु
कहाँ कहाँ
भटकते हैं
यतीम मजबूर विषय,
गुमराहों को
पुरानी सुखद पगडंडियों में हाँकने से
रहनुमाओं को
फ़ुर्सत नहीं!!!
स्वयं पर
शोध करवाने हेतु
कहाँ कहाँ
भटकते हैं
यतीम मजबूर विषय,
गुमराहों को
पुरानी सुखद पगडंडियों में हाँकने से
रहनुमाओं को
फ़ुर्सत नहीं!!!
तेज़
ऐन्नी कोलों
लंगी
इक शय
के भम्बीरी बणा गई,
ऐने चिर बाद
अज वी
अक्सर
रेहन्दा घुमदा
आपणी धुरी ते मैं,
आ जावे
बस इक वार फेर
ते समजा जावे
कि की सी?
ते क्यों सी?
हाटों से उठ
गलियों से चल
दरवाज़ों को खोल
डयोढ़ियों को लाँघ
आँखों कानों मस्तिष्क की
खिड़कियों से
वजूद के कमरों में आ,
समा गया है
बाज़ार
इन्सां की रूह में,
कोई बिकना न चाहे
तो क्या करे!