दुआ
उसने वहाँ माँगी
जहाँ
शायद
ख़ुदा न था,
ख़ुदी में
इतना दूर
निकल आया था वो
शायद!
वज़ीर ख़ान
तू व्यर्थ ही
नर्क गया,
सिक्खी के
साहबज़ादे ही
आज
चुनवाने को हैं
गुरु की बात
उसी के द्वार...
दस मिनट में
वो शख़्स
अपनी
अनलिखी
आत्मकथा के
अंश सुना गया,
छोड़ गया मुझे
लटकता
कौतुहल की रस्सी से
प्रश्नों के पेड़ पर
उल्टा,
मजबूर,
करने को पूरी
कथा वो उसकी
कहानी से अपनी...
जितने भी ईश्वर
तेरी पहचान में हैं,
आज सब को बुला ले,
तेरे वजूद
का है
यज्ञ
कर आह्वान
सारे अपने
बुला ले...