Saturday, July 29, 2017

चाय

चाय में दूध
उन्हें पसंद नहीं था,

चीनी
पहले से थी
पास उनके,

उठाई
चुपचाप
बस
बिखरी
चाय पत्ती
इधर उधर से
और
चली गईं
चींटियाँ।

ख़ौफ़

मौत का
ख़ौफ़
रहने दो रिआया में
उठने न दो,
सरफ़रोश
न हो जायें
बचे
आग के दीये,
हवाओं से कहो
हद में रहो!

मर्ज़ी

न हो
मेरी मर्ज़ी से,
तेरी मर्ज़ी
से सही,

ख़ुदी का
न सही
ख़ुदा का
सही!

लत

हाँ
रहता है
एक
पान का ग़ुलाम
चिड़िया की तरह
अंकों वाले
ईंटों से
ताश के पत्तों
के घरों में,

होते
होने देते
स्वयं की
गिनाई
छंटाई
बंटाई
दुनिया के जुए में
लत की तरह।

दुर्लभ

कौन
सुनता है
एक अच्छा
साक्षात्कार
सबेरे सबेरे
और वो भी
इतवार को,

यूँ ही
होता हो
दुर्लभ
आत्म साक्षात्कार
तो कोई
क्यों न करे!