आज फिर
दुनिया पीछे छूट रही थी
और मैं
मन्ज़िल की ओर
रफ़्तार से
था बढ़ रहा,
आज फिर
अतीत को मायूस किये बिना
शताब्दी में
मुझे
सीट थी मिली
उल्टी दिशा की...
आज फिर
दुनिया पीछे छूट रही थी
और मैं
मन्ज़िल की ओर
रफ़्तार से
था बढ़ रहा,
आज फिर
अतीत को मायूस किये बिना
शताब्दी में
मुझे
सीट थी मिली
उल्टी दिशा की...
हज़ार चाहा कि दबे पाँव गुज़र जायें उस दहलीज़ से,
गुज़र गुज़र कर उसी रहगुज़र से गुज़रना पड़ा।
आई तो ज़रूर वो मन्ज़िल उस सफ़र के बाद,
हाय उस सफ़र को किस किस मुक़ाम से गुज़रना पड़ा।
उग आए हैं हर तरफ़ ज़हरीले विचारों के कुकरमुत्ते,
ये कैसी हुई है तेज़ाब की बारिश अब के!
उभर उभर कर आये हैं चरित्र सब के,
ये किस किस के उतरे हैं हिजाब अब के!