Sunday, March 24, 2019

आज फिर

आज फिर
दुनिया पीछे छूट रही थी
और मैं
मन्ज़िल की ओर
रफ़्तार से
था बढ़ रहा,

आज फिर
अतीत को मायूस किये बिना
शताब्दी में
मुझे
सीट थी मिली
उल्टी दिशा की...

Thursday, January 31, 2019

दम

हमसफ़र, हमराज़, हमख़्याल थे गर हम इतने,
दम आख़िरी तन्हा मेरे हमदम क्यों पीना पड़ा।

मर्ज़ी

है अगर वाकई उसी की मर्ज़ी से सब दुनिया,
क्या हुआ जो इशारों पर किसी के कुछ हुआ!

सफ़र

हज़ार चाहा कि दबे पाँव गुज़र जायें उस दहलीज़ से,
गुज़र गुज़र कर उसी रहगुज़र से गुज़रना पड़ा।

आई तो ज़रूर वो मन्ज़िल उस सफ़र के बाद,
हाय उस सफ़र को किस किस मुक़ाम से गुज़रना पड़ा।

Wednesday, November 7, 2018

कुकरमुत्ते

उग आए हैं हर तरफ़ ज़हरीले विचारों के कुकरमुत्ते,
ये कैसी हुई है तेज़ाब की बारिश अब के!
उभर उभर कर आये हैं चरित्र सब के,
ये किस किस के उतरे हैं हिजाब अब के!