Thursday, July 17, 2014

तितलियाँ

बरसात
की सुबह,
स्कूल
के बाहर,
खुल
गयीं
रंग बिरंगी
तितलियों
सी
छतरियाँ,

फूल
से
बच्चों
पर
मंडराती
रहीं|

कलम

कलम
मेरी
है,

लिखती
तुझमें
है,

समझ
लेता
है
तू,
मुझे,
जो
बिन
कहे|

ईलाज

कुछ
ला ईलाज
मर्ज़ों
का
हल
हमनें
ख़ुद ही
खोज
लिया,

बस
कुबूल
करने की
देर
थी,
मुक्त
हो
गए|

मुहब्बत

कर
तो लूँ
आपसे
मुहब्बत
लेकिन,

सोच
में
हूँ,

कौन सी
शै
कायनात में
मुहब्बत
के
काबिल
नहीं
है।

रेडियो

अटक
गई
है
कहीं
ज़िन्दगी
की
सुई,
किसी
ग्रामोफ़ोन
की
तरह,

तरसता
है
दिल
रेडियो सी
आज़ादी,
तोड़ कर
चखने को,
हवा से,
उमंगों
के
स्टेशन।